महिला बांझपन का कारण, लक्षण और उपचार | female infertility in hindi
महिला बांझपन (Female Infertility in Hindi), यानी महिला का गर्भधारण न कर पाना, एक ऐसी स्थिति है जो भारत में कई परिवारों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है। यह सिर्फ एक मेडिकल समस्या नहीं है, बल्कि इससे सामाजिक और मानसिक तनाव भी जुड़ा होता है। जब कोई जोड़ा एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाता, तो उसे बांझपन की स्थिति माना जाता है।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बांझपन किसी की गलती नहीं है। यह एक स्वास्थ्य स्थिति है, जैसे डायबिटीज या थायरॉइड, जिसका सही इलाज संभव है। आज मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है। SCI हॉस्पिटल जैसे उन्नत संस्थानों में विश्व स्तरीय तकनीक और अनुभवी डॉक्टरों की मदद से हजारों जोड़ों ने संतान सुख प्राप्त किया है।
इस लेख में हम महिला बांझपन के हर पहलू को बहुत ही सरल भाषा में समझेंगे। हम इसके कारण, लक्षण, जांच प्रक्रिया और उपलब्ध आधुनिक उपचारों के बारे में विस्तार से बात करेंगे, ताकि आप सही जानकारी के साथ अपने लिए सही फैसला ले सकें। याद रखिए, सही जानकारी और सही समय पर उठाया गया कदम आपकी इस यात्रा को आसान बना सकता है। SCI हॉस्पिटल की पूरी टीम इस सफर में आपके साथ है, आपको सही मार्गदर्शन देने और आपका हाथ थामने के लिए।
कारण
महिला बांझपन के कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। यह किसी एक बड़ी समस्या या कई छोटी-छोटी समस्याओं का मिला-जुला परिणाम भी हो सकता है। इसे समझना ऐसा है जैसे हम यह पता लगा रहे हैं कि बगीचे में पौधा क्यों नहीं उग रहा - क्या बीज में कमी है, मिट्टी ठीक नहीं है, या पानी सही से नहीं मिल रहा? ठीक उसी तरह, गर्भधारण के लिए महिला के शरीर के कई अंगों और हॉर्मोन्स का सही तालमेल में काम करना ज़रूरी है।
ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याएं
ओव्यूलेशन वह प्रक्रिया है जिसमें हर महीने अंडाशय (ओवरी) से एक अंडा निकलकर फैलोपियन ट्यूब में आता है। अगर यह प्रक्रिया ठीक से नहीं होती, तो गर्भधारण संभव नहीं है। यह महिला बांझपन का सबसे आम कारण है। इसके कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
- पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS): यह आज की जीवनशैली से जुड़ी एक बहुत ही आम समस्या है। इसमें हॉर्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे अंडाशय में छोटी-छोटी गांठें (सिस्ट) बन जाती हैं और अंडा समय पर नहीं बन पाता। इसके लक्षणों में अनियमित पीरियड्स, चेहरे पर बाल, मुंहासे और वजन बढ़ना शामिल हैं। SCI हॉस्पिटल में PCOS के लिए विशेष क्लीनिक हैं, जहां दवाइयों और जीवनशैली में बदलाव से इसका सफल इलाज किया जाता है।
- हार्मोनल असंतुलन: शरीर में कई हॉर्मोन्स होते हैं जो प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करते हैं, जैसे थायरॉइड और प्रोलैक्टिन। अगर थायरॉइड हॉर्मोन बहुत कम या बहुत ज्यादा है, तो यह ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन का स्तर बढ़ने से भी पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं। एक साधारण से ब्लड टेस्ट से इन हॉर्मोन्स की जांच की जा सकती है।
- उम्र का प्रभाव: महिलाओं में उम्र बढ़ने के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता दोनों में कमी आती है। 35 साल की उम्र के बाद यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसे ऐसे समझें कि जन्म के समय हर महिला के पास अंडों का एक निश्चित भंडार होता है, जो समय के साथ खत्म होता जाता है।
- प्रीमैच्योर ओवेरियन फेलियर (POF): इसमें 40 साल की उम्र से पहले ही अंडाशय काम करना बंद कर देते हैं। ऐसा जेनेटिक कारणों, कीमोथेरेपी या किसी अन्य बीमारी की वजह से हो सकता है।
फैलोपियन ट्यूब से जुड़ी समस्याएं
फैलोपियन ट्यूब वह रास्ता है जहां अंडे और स्पर्म का मिलन होता है। अगर इस रास्ते में कोई रुकावट या क्षति हो, तो गर्भधारण में मुश्किल आती है। यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
- ट्यूब का बंद होना (Blocked Tubes): पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिजीज (PID) जैसे संक्रमण, टीबी (Tuberculosis), या पहले हुई किसी सर्जरी के कारण फैलोपियन ट्यूब बंद हो सकती हैं। जब ट्यूब बंद होती है, तो स्पर्म अंडे तक नहीं पहुंच पाता।
- एंडोमेट्रियोसिस (Endometriosis): इस स्थिति में गर्भाशय के अंदर की परत (एंडोमेट्रियम) गर्भाशय के बाहर, जैसे ट्यूब या अंडाशय पर बढ़ने लगती है। इससे ट्यूब में रुकावट आ सकती है और सूजन हो सकती है, जो प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है। इसमें पीरियड्स के दौरान बहुत तेज दर्द होता है। SCI हॉस्पिटल में एंडोमेट्रियोसिस के इलाज के लिए आधुनिक लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है।
गर्भाशय या सर्विक्स से जुड़ी समस्याएं
भ्रूण (Embryo) को 9 महीने तक विकसित होने के लिए एक स्वस्थ गर्भाशय की जरूरत होती है। गर्भाशय या उसके मुख (सर्विक्स) में कोई समस्या होने पर भी बांझपन हो सकता है।
- गर्भाशय में फाइब्रॉइड्स या पॉलिप्स: ये गर्भाशय की मांसपेशियों में होने वाली गैर-कैंसर गांठें होती हैं। अगर इनका आकार बड़ा हो या ये गर्भाशय के अंदर ऐसी जगह पर हों जहां भ्रूण को चिपकना है, तो ये गर्भधारण में बाधा डाल सकती हैं।
- गर्भाशय का आकार या बनावट में जन्मजात समस्या: कुछ महिलाओं में जन्म से ही गर्भाशय का आकार सामान्य नहीं होता, जैसे कि सेप्टेट यूटरस (पर्दे वाला गर्भाशय)। इससे गर्भपात का खतरा भी बढ़ जाता है।
- सर्विक्स की समस्याएं: सर्विक्स गर्भाशय का निचला हिस्सा होता है। अगर यहां बनने वाला म्यूकस (बलगम) बहुत गाढ़ा हो, तो यह स्पर्म को ऊपर जाने से रोक सकता है।
जीवनशैली और अन्य कारण
कई बार हमारी रोजमर्रा की आदतें भी हमारी प्रजनन क्षमता पर गहरा असर डालती हैं। अच्छी बात यह है कि इन आदतों को सुधारकर हम अपनी फर्टिलिटी को बेहतर कर सकते हैं।
- वजन: शरीर का वजन बहुत ज्यादा या बहुत कम होना, दोनों ही हॉर्मोन्स के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकते हैं।
- तनाव: लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हॉर्मोन का स्तर बढ़ा देता है, जो प्रजनन हॉर्मोन्स के काम में रुकावट डालता है।
- खान-पान: संतुलित आहार की कमी, ज्यादा जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड खाना भी शरीर को कमजोर करता है और प्रजनन क्षमता पर असर डालता है।
- धूम्रपान और शराब: धूम्रपान करने से अंडों की गुणवत्ता तेजी से घटती है। शराब का सेवन भी हॉर्मोनल संतुलन को बिगाड़ता है।
- कुछ बीमारियाँ: अनियंत्रित डायबिटीज, ऑटोइम्यून बीमारियां या कैंसर के इलाज (कीमोथेरेपी/रेडिएशन) का भी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है।
लक्षण
महिला बांझपन का सबसे मुख्य और सीधा लक्षण तो गर्भधारण न कर पाना ही है। लेकिन इसके अलावा भी शरीर कुछ ऐसे संकेत देता है, जिन्हें पहचानकर समय पर डॉक्टर की सलाह ली जा सकती है। इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि ये किसी अंदरूनी समस्या का संकेत हो सकते हैं।
सबसे मुख्य लक्षण: गर्भधारण न कर पाना
अगर आपकी उम्र 35 साल से कम है और आप एक साल से बिना किसी सुरक्षा के नियमित संबंध बना रहे हैं, फिर भी गर्भधारण नहीं हो रहा है, तो यह बांझपन का सबसे बड़ा संकेत है। अगर आपकी उम्र 35 साल से ज्यादा है, तो यह समय सीमा 6 महीने है। ऐसा इसलिए क्योंकि 35 के बाद प्रजनन क्षमता में तेजी से गिरावट आती है, इसलिए समय पर जांच कराना महत्वपूर्ण हो जाता है।
मासिक धर्म (पीरियड्स) से जुड़े लक्षण
पीरियड्स का चक्र सीधे तौर पर ओव्यूलेशन से जुड़ा होता है। इसलिए इसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी एक बड़ा संकेत है। इन लक्षणों पर ध्यान देना ज़रूरी है:
- अनियमित पीरियड्स: अगर आपका मासिक चक्र 21 दिन से छोटा या 35 दिन से लंबा है, या हर महीने अलग-अलग समय पर आता है, तो यह अनियमित माना जाता है। यह PCOS या अन्य हॉर्मोनल समस्याओं का संकेत हो सकता है।
- पीरियड्स का न आना (Amenorrhea): अगर आपको लगातार तीन महीने या उससे ज्यादा समय तक पीरियड्स नहीं आते हैं, तो यह एक गंभीर लक्षण है और आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
- बहुत ज्यादा या बहुत कम ब्लीडिंग: पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना, जिसमें हर घंटे पैड बदलना पड़े, यह फाइब्रॉइड्स का लक्षण हो सकता है। वहीं, बहुत कम ब्लीडिंग या सिर्फ स्पॉटिंग होना हॉर्मोनल समस्या की ओर इशारा करता है।
- पीरियड्स में बहुत तेज दर्द (Dysmenorrhea): पीरियड्स में हल्का-फुल्का दर्द सामान्य है, लेकिन अगर दर्द इतना तेज हो कि आप अपने रोजमर्रा के काम न कर पाएं, तो यह एंडोमेट्रियोसिस या फाइब्रॉइड्स जैसी समस्या का संकेत हो सकता है।
हॉर्मोनल बदलाव के संकेत
जब शरीर में प्रजनन हॉर्मोन्स (जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) का संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर पर इसके कुछ बाहरी लक्षण भी दिखाई देते हैं।
- त्वचा में बदलाव: चेहरे या शरीर पर अचानक बहुत सारे मुंहासे निकलना, खासकर जब आप किशोरावस्था में न हों, हॉर्मोनल असंतुलन का संकेत है।
- चेहरे पर अनचाहे बाल (Hirsutism): ठोड़ी, ऊपरी होंठ या छाती पर मोटे और काले बालों का उगना एंड्रोजन (पुरुष हॉर्मोन) के बढ़े हुए स्तर का संकेत है, जो अक्सर PCOS में देखा जाता है।
- बालों का झड़ना या पतला होना: सिर के बालों का तेजी से झड़ना या पतला होना भी थायरॉइड या अन्य हॉर्मोनल गड़बड़ी का लक्षण हो सकता है।
- वजन में अचानक बदलाव: बिना किसी खास कारण के वजन का तेजी से बढ़ना या घटना भी हॉर्मोनल समस्याओं की ओर इशारा करता है।
अन्य शारीरिक लक्षण
कुछ और भी लक्षण हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है:
- संबंध बनाते समय दर्द (Dyspareunia): अगर शारीरिक संबंध बनाने के दौरान दर्द होता है, तो यह संक्रमण, एंडोमेट्रियोसिस या योनि में सूखेपन का कारण हो सकता है।
- पेल्विक एरिया में दर्द: पीरियड्स के अलावा भी पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द रहना किसी संक्रमण या अंदरूनी समस्या का लक्षण हो सकता है।
आपको डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?
अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो संकोच न करें। समय पर डॉक्टर से सलाह लेना बहुत ज़रूरी है। आपको तुरंत एक फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलना चाहिए यदि:
- आपकी उम्र 35 से कम है और एक साल से गर्भधारण की कोशिश कर रही हैं।
- आपकी उम्र 35 से 40 के बीच है और छह महीने से कोशिश कर रही हैं।
- आपकी उम्र 40 से ज्यादा है।
- आपके पीरियड्स बहुत अनियमित हैं या नहीं आते हैं।
- आपको पीरियड्स में बहुत तेज दर्द होता है।
- आपको पहले कभी पेल्विक संक्रमण, गर्भपात या कैंसर का इलाज हुआ हो।
SCI हॉस्पिटल में हमारे डॉक्टर आपकी बात को बहुत ध्यान से सुनते हैं और आपकी हर शंका का समाधान करते हैं। पहली मुलाकात में हम आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री को समझते हैं ताकि हम आपके लिए एक व्यक्तिगत जांच और इलाज की योजना बना सकें।
उपचार
महिला बांझपन का इलाज आज पहले से कहीं ज्यादा सफल और सुलभ है। यह खबर हर उस जोड़े के लिए उम्मीद की किरण है जो संतान सुख की चाहत रखता है। इलाज का तरीका बांझपन के कारण, आपकी उम्र, और आपकी स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। SCI हॉस्पिटल में हम सबसे पहले सही जांच करके समस्या की जड़ तक पहुंचते हैं और फिर आपके लिए सबसे उपयुक्त इलाज का विकल्प चुनते हैं।
उपचार से पहले सही जांच (Diagnosis)
सही इलाज के लिए सही निदान पहला कदम है। डॉक्टर आपको कुछ टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं ताकि समस्या का सटीक पता चल सके। यह प्रक्रिया डरावनी नहीं होती है और हमारे हॉस्पिटल में सभी जांचें बहुत ही आरामदायक माहौल में की जाती हैं। मुख्य जांचें इस प्रकार हैं:
- ब्लड टेस्ट: यह सबसे आम और ज़रूरी जांच है। इससे आपके शरीर में FSH, LH, प्रोलैक्टिन, AMH और थायरॉइड जैसे हॉर्मोन्स के स्तर का पता चलता है। AMH टेस्ट से यह अंदाज़ा लगाया जाता है कि आपकी ओवरी में अंडों का भंडार कितना है।
- पेल्विक अल्ट्रासाउंड: इस जांच में साउंड वेव की मदद से गर्भाशय, अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब की तस्वीर देखी जाती है। इससे फाइब्रॉइड्स, सिस्ट या गर्भाशय की बनावट में किसी भी समस्या का पता चल जाता है। यह एक दर्द रहित प्रक्रिया है।
- हिस्टेरोसाल्पिंगोग्राफी (HSG): यह एक विशेष प्रकार का एक्स-रे है जिससे यह पता लगाया जाता है कि आपकी फैलोपियन ट्यूब खुली हैं या बंद। इसमें गर्भाशय के अंदर एक डाई डालकर एक्स-रे लिया जाता है।
- सोनोहिस्टेरोग्राम (Saline Infusion Sonogram): इस जांच में गर्भाशय में सलाइन (नमक का पानी) डालकर अल्ट्रासाउंड किया जाता है, जिससे गर्भाशय के अंदर की परत को और भी साफ तरीके से देखा जा सकता है और पॉलिप्स जैसी छोटी समस्याओं का भी पता चल जाता है।
- डायग्नोस्टिक लैप्रोस्कोपी: यदि अन्य जांचों से कारण स्पष्ट न हो, तो डॉक्टर लैप्रोस्कोपी की सलाह दे सकते हैं। यह एक छोटी सी सर्जरी है, जिसमें पेट पर एक छोटा सा चीरा लगाकर कैमरे की मदद से अंदर के अंगों (गर्भाशय, ट्यूब, अंडाशय) को सीधे देखा जाता है। इससे एंडोमेट्रियोसिस या ट्यूब की रुकावट का सटीक पता चल जाता है।
दवाओं से उपचार
कई मामलों में, खासकर जहां ओव्यूलेशन की समस्या हो, इलाज सिर्फ दवाइयों से ही संभव हो जाता है।
- ओव्यूलेशन बढ़ाने वाली दवाएं: क्लोमिफीन साइट्रेट (Clomiphene) और लेट्रोज़ोल (Letrozole) जैसी दवाइयां दी जाती हैं। ये दवाइयां दिमाग को संकेत देकर अंडाशय को अंडा बनाने और रिलीज करने के लिए उत्तेजित करती हैं। डॉक्टर आपके पीरियड्स के शुरुआती दिनों में इन्हें लेने की सलाह देते हैं।
- हार्मोन के इंजेक्शन: अगर खाने वाली दवाइयों से फायदा न हो, तो गोनाडोट्रोपिन (Gonadotropins) जैसे हॉर्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं। ये सीधे अंडाशय पर काम करते हैं और अंडे बनाने में मदद करते हैं। इनका इस्तेमाल IUI और IVF प्रक्रियाओं में भी किया जाता है।
सर्जरी द्वारा उपचार
अगर बांझपन का कारण कोई शारीरिक समस्या है, जैसे कि बंद ट्यूब या फाइब्रॉइड्स, तो सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। SCI हॉस्पिटल में सभी सर्जरी न्यूनतम इनवेसिव (Minimally Invasive) तकनीकों से की जाती हैं, जिससे रिकवरी बहुत तेज होती है।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी:
इस तकनीक का उपयोग एंडोमेट्रियोसिस को हटाने, अंडाशय से सिस्ट निकालने या बंद फैलोपियन ट्यूब को खोलने के लिए किया जाता है। इसे की-होल सर्जरी भी कहते हैं क्योंकि इसमें बड़े चीरे की जगह छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं।
हिस्टेरोस्कोपिक सर्जरी:
इसमें योनि के रास्ते से एक पतला कैमरा (हिस्टेरोस्कोप) गर्भाशय के अंदर डाला जाता है। इसका उपयोग गर्भाशय के अंदर से फाइब्रॉइड्स, पॉलिप्स या पर्दे (septum) को हटाने के लिए किया जाता है। इसमें कोई बाहरी चीरा नहीं लगता।
असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART)
जब दवाओं या सर्जरी से बात नहीं बनती, तो ART तकनीकें गर्भधारण में मदद करती हैं। SCI हॉस्पिटल ART तकनीकों, विशेषकर IVF में अपनी विशेषज्ञता और उच्च सफलता दर के लिए जाना जाता है।
इंट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन (IUI):
यह एक सरल प्रक्रिया है। इसमें पुरुष के स्पर्म को लैब में साफ और सांद्रित करके ओव्यूलेशन के समय सीधे महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है। इससे स्पर्म को अंडे तक पहुंचने में आसानी होती है। यह उन मामलों में उपयोगी है जहां स्पर्म में हल्की कमी हो या बांझपन का कारण स्पष्ट न हो।
इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF):
इसे आम भाषा में 'टेस्ट ट्यूब बेबी' भी कहा जाता है। यह सबसे उन्नत और सफल तकनीकों में से एक है। इसकी प्रक्रिया के मुख्य चरण हैं:
- अंडे बनाना: महिला को 10-12 दिनों तक हॉर्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं ताकि अंडाशय में एक से ज्यादा अंडे बनें।
- अंडे निकालना: जब अंडे तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें एक मामूली प्रक्रिया द्वारा शरीर से बाहर निकाल लिया जाता है।
- निषेचन (Fertilization): लैब में इन अंडों को पुरुष के स्पर्म के साथ मिलाया जाता है ताकि भ्रूण (embryo) बन सकें।
- भ्रूण स्थानांतरण (Embryo Transfer): सबसे स्वस्थ एक या दो भ्रूणों को एक पतली ट्यूब के जरिए महिला के गर्भाशय में वापस रख दिया जाता है।
जीवनशैली में बदलाव
किसी भी मेडिकल ट्रीटमेंट के साथ-साथ जीवनशैली में कुछ सकारात्मक बदलाव लाना बहुत ज़रूरी है। यह न केवल आपकी प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है बल्कि इलाज की सफलता दर को भी बेहतर करता है।
- संतुलित आहार: अपनी डाइट में हरी सब्जियां, फल, दालें, और साबुत अनाज शामिल करें। प्रोसेस्ड फूड, मैदा, और ज्यादा चीनी से बचें।
- नियमित व्यायाम: हफ्ते में 5 दिन कम से कम 30 मिनट तक टहलना, योग या हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें। बहुत ज्यादा भारी व्यायाम से बचें।
- वजन कंट्रोल करें: अगर आपका वजन ज्यादा है, तो 5-10% वजन कम करने से भी ओव्यूलेशन नियमित हो सकता है।
- तनाव कम करें: योग, ध्यान (meditation) या अपनी पसंद का कोई काम करके तनाव को नियंत्रित करें।
- पूरी नींद लें: रोज 7-8 घंटे की गहरी नींद लेना हॉर्मोन्स के संतुलन के लिए बहुत ज़रूरी है।
इलाज का खर्च (Cost)
बांझपन के इलाज का खर्च उसके प्रकार पर निर्भर करता है। दवाओं का खर्च कम होता है, जबकि IUI और IVF जैसी प्रक्रियाओं में ज्यादा खर्च आता है। SCI हॉस्पिटल में हम पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। हम इलाज शुरू करने से पहले ही आपको पूरे खर्च की जानकारी देते हैं। हम समझते हैं कि यह एक बड़ा वित्तीय निर्णय हो सकता है, इसलिए हमारे यहां आसान किश्तों (EMI) और इंश्योरेंस से जुड़ी सलाह की सुविधा भी उपलब्ध है, ताकि आप बिना किसी वित्तीय चिंता के अपना इलाज करा सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल 1: महिला बांझपन क्या होता है?
जब एक महिला एक साल तक नियमित संबंध बनाने के बाद भी बिना गर्भनिरोधक के प्रेग्नेंट नहीं हो पाती, तो उसे बांझपन (Infertility) कहते हैं।
सवाल 2: क्या बांझपन का इलाज संभव है?
आजकल आईवीएफ, दवाइयों, सर्जरी व सही खानपान की मदद से ज़्यादातर महिलाओं का इलाज संभव है।
सवाल 3: बांझपन के कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?
गर्भधारण ना होना, पीरियड्स अनियमित होना, बहुत तेज दर्द, अचानक वजन बढ़ना या बाल झड़ना इसके आम लक्षण हैं।
सवाल 4: बांझपन की जांच के लिए कौनसे टेस्ट किए जाते हैं?
ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, HSG, लैप्रोस्कोपी जैसी जांचें की जाती हैं, जो SCI हॉस्पिटल में आसानी से उपलब्ध हैं।
सवाल 5: इलाज में कितना खर्च आता है?
इलाज का खर्च किस तरह की समस्या और इलाज पर निर्भर करता है; दवाइयों का खर्च कम, आईवीएफ का खर्च ज्यादा हो सकता है। हॉस्पिटल में EMI और इंश्योरेंस की सुविधा रहती है।
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