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डायलिसिस इन हिंदी: पूरी जानकारी मरीजों के लिए


डायलिसिस इन हिंदी: पूरी जानकारी मरीजों के लिए

परिचय

भारत में किडनी रोगी लगातार बढ़ रहे हैं, और डायलिसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जो किडनी फेल्योर के मरीजों की ज़िंदगी बचाने में अहम भूमिका निभाती है। यह रक्त शुद्धिकरण की एक चिकित्सा विधि है जो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त तरल को निकालकर मरीज के जीवन को बचाती है। इस लेख में डायलिसिस से संबंधित सभी जरूरी बातें स्वास्थ्यजनों और मरीजों के लिए आसान हिंदी में विस्तार से समझाई गई हैं, ताकि आप अपने इलाज और लाइफस्टाइल के लिए सही निर्णय ले सकें।

डायलिसिस क्या है?

डायलिसिस एक चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें आपके रक्त से अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल पदार्थ निकाले जाते हैं जब आपके गुर्दे ठीक से काम नहीं कर पा रहे हों। सामान्य स्थिति में किडनी रक्त को फ़िल्टर करती है, अपशिष्ट और अनावश्यक द्रव को मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती है। यह प्रक्रिया तीन मुख्य सिद्धांतों पर काम करती है - passive diffusion (निष्क्रिय प्रसार), ultrafiltration (अल्ट्राफिल्ट्रेशन) और convection (संवहन)।

डायलिसिस में अर्ध-पारगम्य झिल्ली (semi-permeable membrane) का उपयोग करके रक्त से छोटे अणु वाले अपशिष्ट पदार्थों को अलग किया जाता है, जबकि लाल रक्त कोशिकाएं और बड़े प्रोटीन अणु शरीर में ही रहते हैं। जब किडनी फेल हो जाती है या उनका कार्य बहुत कम हो जाता है तो डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है।

डायलिसिस क्यों जरूरी है?

किडनी शरीर की फिल्टरिंग मशीन हैं – ये रक्त में जमा अपशिष्ट, विषाक्त पदार्थ और ऑवरफ्लूइड को अलग करती हैं। जब CKD (Chronic Kidney Disease) या अन्य किडनी रोग के चलते किडनी की कार्यक्षमता घट जाती है, तो हमारे शरीर में हानिकारक तत्व इकट्ठा होने लगते हैं। किडनी रोग को पाँच चरणों (stages) में बांटा गया है - Stage 1 से Stage 5 तक, जिसमें GFR (Glomerular Filtration Rate) यानी गुर्दे की फ़िल्टर करने की क्षमता को मापा जाता है।

जब GFR 15 mL/min/1.73 m² से कम हो जाती है (Stage 5), तो इसे kidney failure कहते हैं और डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। हालांकि, आधुनिक शोध बताते हैं कि डायलिसिस शुरू करने का सही समय केवल GFR पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मरीज के लक्षणों पर भी निर्भर करता है। Uremia (रक्त में अपशिष्ट का संचय) के लक्षणों में अत्यधिक थकान, खुजली, सूजन, भूख न लगना, उलटी, सांस लेने में परेशानी, और मानसिक भ्रम शामिल हैं। इन सिचुएशन में डायलिसिस जीवन रक्षक प्रक्रिया है।

डायलिसिस के प्रकार

हेमोडायलिसिस (Hemodialysis)

हेमोडायलिसिस में रक्त को एक मशीन (Dialyzer या कृत्रिम किडनी) के जरिए शरीर से बाहर निकाल कर साफ किया जाता है और फिर साफ़ रक्त वापस शरीर में डाल दिया जाता है। मरीज को अस्पताल या डायलिसिस सेंटर में आना पड़ता है, हालांकि घर पर भी हेमोडायलिसिस की सुविधा उपलब्ध है। प्रत्येक सत्र में 3 से 4 घंटे लगते हैं और सप्ताह में 2-3 बार यह प्रक्रिया करनी होती है।

हेमोडायलिसिस में diffusion और ultrafiltration दोनों प्रक्रियाओं का उपयोग होता है - diffusion से अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं और ultrafiltration से अतिरिक्त तरल पदार्थ। घर पर हेमोडायलिसिस करने वाले मरीज अधिक लचीले शेड्यूल पर इलाज कर सकते हैं, जैसे सप्ताह में 3-7 बार, प्रत्येक सत्र 2-5 घंटे का।

पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis)

इसमें patient की abdominal cavity (पेट) की lining (पेरिटोनियम) dialyzer के रूप में काम करती है। एक कैथेटर पेट में डाला जाता है, जिससे dialysis fluid शरीर में जाता है और अपशिष्ट अवशोषित करके बाहर आ जाता है। यह प्रक्रिया घर पर भी की जा सकती है, जो मरीजों को अधिक स्वतंत्रता देती है।

पेरिटोनियल डायलिसिस के दो मुख्य प्रकार हैं - Continuous Ambulatory Peritoneal Dialysis (CAPD) और Automated Peritoneal Dialysis (APD)। CAPD में दिन में कई बार मैनुअल fluid exchange होता है, जबकि APD में रात में मशीन द्वारा स्वचालित exchange होता है। यह विधि तीनों प्रक्रियाओं का उपयोग करती है - diffusion, ultrafiltration और convection।

हेमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस में अंतर

हेमोडायलिसिस में मशीन द्वारा रक्त को शरीर के बाहर साफ किया जाता है, जबकि पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की झिल्ली शरीर के अंदर ही फिल्टर का काम करती है। हेमोडायलिसिस के लिए dialysis center जाना पड़ता है (या घर पर विशेष व्यवस्था), जबकि पेरिटोनियल डायलिसिस अधिकतर घर पर ही की जा सकती है। हेमोडायलिसिस आमतौर पर अधिक महंगी होती है, जबकि पेरिटोनियल डायलिसिस तुलनात्मक रूप से सस्ती है।

हेमोडायलिसिस प्रक्रिया

हेमोडायलिसिस शुरू करने से पहले, एक वैस्कुलर एक्सेस (vascular access) बनाना जरूरी होता है। यह तीन प्रकार की होती है - AV Fistula (arteriovenous fistula), AV Graft, या Catheter। AV Fistula सबसे बेहतर विकल्प है क्योंकि यह लंबे समय तक चलता है और संक्रमण व रक्त के थक्कों की संभावना कम होती है।

AV Fistula बनाने के लिए, vascular surgeon एक धमनी (artery) और शिरा (vein) को जोड़ देते हैं, आमतौर पर बाजू या कलाई में। इससे शिरा में रक्त का दबाव और प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे वह मजबूत और बड़ी हो जाती है। Fistula को तैयार होने में 6-12 सप्ताह लग सकते हैं। AV Graft में एक प्लास्टिक ट्यूब से धमनी और शिरा को जोड़ा जाता है। Catheter आमतौर पर अल्पकालिक उपयोग के लिए होता है और गर्दन, छाती या पैर की बड़ी शिरा में लगाया जाता है।

डायलिसिस के दौरान, access के जरिए रक्त को dialysis machine में भेजा जाता है। मशीन में dialyzer (कृत्रिम किडनी) होता है जहां अर्ध-पारगम्य झिल्ली के एक तरफ रक्त और दूसरी तरफ dialysate (डायलिसिस द्रव) होता है। अपशिष्ट पदार्थ, अतिरिक्त द्रव, और खतरनाक electrolytes को निकाल दिया जाता है। शुद्ध रक्त वापस शरीर में भेजा जाता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस प्रक्रिया

मरीज के पेट में एक कैथेटर फिट किया जाता है, जो एक छोटी सर्जरी द्वारा किया जाता है। उसके जरिए डायलिसेट (Dialysis fluid) शरीर में डाला जाता है। यह द्रव पेट की गुहा में 4-6 घंटे तक रहता है और इस दौरान पेरिटोनियम (peritoneum) की रक्त वाहिकाओं से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल को अवशोषित करता है। फिर यह द्रव निकाल दिया जाता है और नया डायलिसेट डाला जाता है - इस प्रक्रिया को exchange कहते हैं।

डायलिसिस कितने दिन में होता है?

हेमोडायलिसिस आमतौर पर सप्ताह में 2-3 बार होता है, और हर सत्र की अवधि 3-4 घंटे होती है। घर पर हेमोडायलिसिस करने वाले मरीजों के लिए अधिक लचीलापन होता है - वे सप्ताह में 3-7 बार, प्रत्येक सत्र 2-5 घंटे का कर सकते हैं। पेरिटोनियल डायलिसिस रोज़ाना या हफ्ते में कई बार किया जा सकता है। CAPD में दिन में 4-5 बार exchange करना पड़ता है, जबकि APD में रात भर मशीन काम करती है।

यह दीर्घकालिक उपचार है जो कई सालों तक जारी रह सकता है। मरीज की स्थिति, किडनी फंक्शन, डाइट व इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के आधार पर डायलिसिस की frequency और duration तय होती है।

डायलिसिस के साइड इफेक्ट्स

डायलिसिस के दौरान और बाद में कुछ सामान्य साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। समझना जरूरी है कि हर मरीज का अनुभव भिन्न हो सकता है।

हेमोडायलिसिस के साइड इफेक्ट्स

निम्न रक्तचाप (hypotension) - रक्त से तरल पदार्थ तेजी से निकलने के कारण। मांसपेशियों में ऐंठन (muscle cramps) - इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के कारण। संक्रमण (infection) - access site पर या रक्तप्रवाह में (sepsis, bacteremia)। खून की कमी (anemia) - लाल रक्त कोशिकाओं का कम उत्पादन। त्वचा में खुजली (itching) - अपशिष्ट पदार्थों के संचय के कारण। थकान (fatigue) और नींद में परेशानी। उलटी व मतली (nausea & vomiting)। उच्च रक्त पोटेशियम स्तर (hyperkalemia), irregular heartbeat, और sudden cardiac arrest।

पेरिटोनियल डायलिसिस के साइड इफेक्ट्स

पेरिटोनाइटिस (peritonitis) - पेरिटोनियम में संक्रमण, जो कैथेटर के आसपास हो सकता है। पेट की मांसपेशियों में कमजोरी (abdominal muscle weakening)। उच्च रक्त शर्करा - dialysate में dextrose के कारण। वजन बढ़ना - dextrose और अतिरिक्त तरल के कारण। हर्निया (hernia), बुखार, और पेट में दर्द।

कैसे मैनेज करें

तरल पदार्थ का सेवन (fluid intake) सीमित करें। निर्धारित डाइट का पालन करें और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयां समय पर लें। डॉक्टर को unusual symptoms की जानकारी तुरंत दें। डायलिसिस टीम के निर्देशों का सख्ती से पालन करें। Access site को साफ और सूखा रखें।

बुखार, संक्रमण, bleeding, बेहोशी, गंभीर कमजोरी, या सांस की तकलीफ होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

लंबे समय तक डायलिसिस के प्रभाव और जटिलताएं

हृदय संबंधी समस्याएं (Cardiovascular Complications)

लंबे समय तक डायलिसिस से हृदय पर काफी दबाव पड़ता है। तरल पदार्थ, रक्तचाप और इलेक्ट्रोलाइट में उतार-चढ़ाव के कारण hypertension, arrhythmias और heart failure का खतरा बढ़ जाता है। अधिकतर डायलिसिस मरीज किडनी फेल्योर से नहीं बल्कि heart failure से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। दो डायलिसिस सत्रों के बीच शरीर में अतिरिक्त तरल जमा होने से हृदय को सामान्य से अधिक रक्त पंप करना पड़ता है, जिससे वह बड़ा हो जाता है और कमजोर हो सकता है।

Valvular diseases (हृदय के वाल्व की बीमारियां), diastolic dysfunction, left ventricular hypertrophy, ischemic heart disease और congestive heart failure आम जटिलताएं हैं। इस समस्या को कम करने के लिए मरीज सप्ताह में डायलिसिस के घंटे बढ़ा सकते हैं - या तो frequency बढ़ाकर या प्रत्येक सत्र की अवधि बढ़ाकर।

हड्डी और खनिज विकार (Bone and Mineral Disorders)

डायलिसिस से calcium, phosphorus और parathyroid hormone के स्तर में असंतुलन हो सकता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है। इस स्थिति को renal osteodystrophy कहते हैं। Parathyroid adenoma और parathyroidectomy (parathyroid gland को हटाना) की जरूरत भी पड़ सकती है। हेमोडायलिसिस मरीजों में serum phosphate और iPTH levels अधिक पाए गए हैं।

इसका प्रबंधन करने के लिए, मरीजों को renal diet का पालन करना चाहिए और prescribed supplements जैसे vitamin D या phosphate binders लेने चाहिए।

अन्य दीर्घकालिक जटिलताएं

Uraemic peripheral neuropathy (परिधीय तंत्रिका विकार) - जिसमें sensory motor neuropathy, demyelinating neuropathy और carpal tunnel syndrome शामिल हैं। Acquired cystic disease (ACD) - किडनी में सिस्ट बनना, जो हेमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस दोनों में समान रूप से देखा गया है। Amyloidosis - प्रोटीन का असामान्य जमाव जो अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।

डायलिसिस के मरीज़ों के लिए आहार

डायलिसिस के मरीजों के लिए आहार और तरल पदार्थ का संतुलन बहुत जरूरी है। गलत डाइट से साइड इफेक्ट्स और जटिलता बढ़ सकती है। किडनी रोग के विभिन्न चरणों में अलग-अलग dietary restrictions होती हैं।

क्या खाएँ

ताजे फल व सब्जियाँ - लेकिन potassium नियंत्रित मात्रा में। दुबला प्रोटीन - अंडा, मछली, चिकन (डायलिसिस मरीजों को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है)। साबुत अनाज जैसे ब्राउन राइस, क्विनोआ। पर्याप्त कैलोरी लेने की कोशिश करें।

क्या न खाएँ या सीमित करें

Sodium (नमक): प्रसंस्कृत भोज्य पदार्थ, डिब्बाबंद व रेडीमेड स्नैक्स जिनमें high sodium होता है। Kidney-friendly diet में आमतौर पर sodium को 2,300 mg प्रति दिन से कम रखा जाता है।

Potassium (पोटेशियम): उच्च पोटेशियम वाले फल जैसे केला, एवोकाडो, खरबूजा, संतरे का रस, टमाटर। पेरिटोनियल डायलिसिस मरीजों के लिए आहार थोड़ा अधिक उदार होता है क्योंकि PD रोजाना potassium निकालता है, इसलिए कुछ PD मरीजों को potassium-rich foods खाने की सलाह दी जाती है।

Phosphorus (फॉस्फोरस): अधिक वसा वाले डेयरी प्रोडक्ट्स, nuts, बीन्स। Phosphorus पेरिटोनियल डायलिसिस में अच्छी तरह से नहीं निकलता, इसलिए PD मरीजों को भी phosphorus सीमित करनी चाहिए।

तरल पदार्थ का प्रबंधन

रोजाना fluid intake को डॉक्टर द्वारा निर्धारित सीमा में रखें। नमकीन खाने से बचें क्योंकि इससे प्यास बढ़ती है। तरल पदार्थ का अधिक सेवन सूजन, सांस की तकलीफ और हृदय पर दबाव बढ़ा सकता है।

डायलिसिस की लागत भारत में

डायलिसिस के खर्च निजी व सरकारी अस्पताल व उपचार की विधि पर निर्भर करते हैं। निजी अस्पताल में हेमोडायलिसिस लगभग ₹12,000-15,000 प्रति माह पड़ सकती है, जबकि पेरिटोनियल डायलिसिस ₹18,000-₹20,000 प्रति माह। सरकारी अस्पताल में कई जगहों पर मुफ्त या बहुत कम खर्च में डायलिसिस उपलब्ध है।

सरकारी योजनाएं और सहायता

Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana (PMJAY): इस योजना के तहत प्रत्येक hemodialysis sitting के लिए ₹2,000 की राशि दी जाती है, चाहे वह empanelled सरकारी या निजी अस्पताल में हो। PMJAY में eligible families को ₹5 लाख का वार्षिक health cover मिलता है। अब तक डायलिसिस के लिए ₹175.89 करोड़ की राशि sanctioned की गई है।

Pradhan Mantri National Dialysis Programme (PMNDP): यह सरकारी कार्यक्रम देश भर में dialysis facilities उपलब्ध कराने के लिए चलाया गया है। मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी के अनुसार coverage लें और स्थानीय व राज्य सरकारी योजनाएं भी जांचें।

डायलिसिस बनाम किडनी ट्रांसप्लांट

किडनी प्रत्यारोपण (kidney transplant) डायलिसिस की तुलना में बेहतर जीवन गुणवत्ता और लंबी उम्र प्रदान कर सकता है। उदाहरण के लिए, डायलिसिस पर रहने वाले 30 वर्षीय मरीज की जीवन प्रत्याशा लगभग 15 साल होती है, जबकि deceased donor kidney transplant से यह 30 साल और living donor transplant से 40 साल तक बढ़ जाती है।

किडनी ट्रांसप्लांट के फायदे

बेहतर जीवन गुणवत्ता - नियमित डायलिसिस सत्रों की आवश्यकता नहीं। अधिक स्वतंत्रता और आज़ादी - काम, पढ़ाई और यात्रा में आसानी। लंबी जीवन प्रत्याशा - डायलिसिस की तुलना में काफी अधिक।

किडनी ट्रांसप्लांट की चुनौतियां

उपयुक्त donor की उपलब्धता - सबसे बड़ी चुनौती। Rejection का खतरा - प्रत्यारोपित किडनी को शरीर अस्वीकार कर सकता है। संक्रमण और सर्जरी से संबंधित जटिलताएं। आजीवन immunosuppressive दवाइयां लेनी पड़ती हैं।

डायलिसिस के फायदे और नुकसान

फायदे: व्यापक रूप से उपलब्ध है और जान बचा सकती है। ट्रांसप्लांट की तुलना में कम invasive।

नुकसान: समय लेने वाली - नियमित clinic visits जरूरी। शारीरिक और भावनात्मक रूप से थकाने वाली। थकान, muscle cramps, low blood pressure जैसे side effects। "यह आपको drain कर देती है" - कई मरीज इसे "miserable" बताते हैं।

डायलिसिस के दौरान जीवनशैली

डायलिसिस पर रहते हुए मरीज सामान्य जिंदगी जी सकते हैं, लेकिन कुछ बदलाव जरूरी हैं। नौकरी व पढ़ाई जारी रखना, वाहन चलाना, और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना संभव है। स्विमिंग और छुट्टी पर जाना भी डॉक्टर से सलाह के बाद किया जा सकता है।

व्यायाम की सिफारिशें

नियंत्रित व हल्का exercise - योग, मॉर्निंग वॉक, स्ट्रेचिंग। Exercise और relaxation techniques डायलिसिस मरीजों में depression के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती हैं। थकावट महसूस हो तो exercise avoid करें। नियमित शारीरिक गतिविधि हृदय स्वास्थ्य, हड्डियों की मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार कर सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सहायता

डायलिसिस मरीजों में depression और anxiety आम हैं। शारीरिक स्वास्थ्य, support systems और coping mechanisms मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। Cognitive Behavioral Therapy (CBT), exercise और relaxation techniques depression के लक्षणों को कम करने में प्रभावी हैं। Counseling भी थोड़ी मदद कर सकती है।

Support groups: समान चुनौतियों का सामना कर रहे अन्य लोगों से जुड़ना भावनात्मक सहायता प्रदान कर सकता है और अलगाव की भावना को कम कर सकता है। Education and empowerment: मरीजों को उनकी स्थिति और उपचार विकल्पों के बारे में जानकारी देने से उन्हें अपने स्वास्थ्य में सक्रिय भूमिका निभाने का अधिकार मिलता है, जिससे anxiety कम होती है। Family involvement: परिवार के सदस्यों को उपचार प्रक्रिया में शामिल करना support systems को मजबूत कर सकता है और मरीज के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

Depression या anxiety के लक्षण महसूस होने पर mental health professional से बात करें। Positive mindset और active lifestyle के साथ इलाज से फायदा होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Dialysis meaning in Hindi क्या है?

डायलिसिस रक्त शुद्धिकरण प्रक्रिया है, जिसमें शरीर से अपशिष्ट व अतिरिक्त तरल निकाला जाता है जब किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती।

Dialysis kya hai और यह कब जरूरी होती है?

जब किडनी 10-15% से कम काम करती है (Stage 5 CKD, GFR < 15 mL/min) और uremia के लक्षण दिखाई देते हैं, तब डायलिसिस की ज़रूरत होती है।

Dialysis kaise hota hai?

वैस्कुलर access (fistula, graft या catheter) के जरिए मशीन द्वारा या पेट की झिल्ली (peritoneum) के माध्यम से अपशिष्ट निकाला जाता है। हेमोडायलिसिस व पेरिटोनियल डायलिसिस अलग-अलग तरीके हैं।

Dialysis kitne din me hota hai?

हेमोडायलिसिस सप्ताह में 2-3 बार, प्रत्येक सत्र 3-4 घंटे का। पेरिटोनियल डायलिसिस अक्सर रोज़ाना - CAPD में दिन में 4-5 exchanges, APD में रात भर।

Dialysis ke side effects in Hindi क्या हैं?

निम्न रक्तचाप, मांसपेशियों में ऐंठन, संक्रमण, खुजली, थकान, उलटी, anemia, hyperkalemia, irregular heartbeat। पेरिटोनियल डायलिसिस में peritonitis, high blood sugar, weight gain, hernia भी हो सकता है।

Dialysis cost in India क्या है?

निजी अस्पताल में ₹12,000-20,000/माह, सरकारी अस्पताल में कम या मुफ्त। PMJAY के तहत प्रति sitting ₹2,000 की सहायता मिलती है। Insurance और सरकारी योजनाओं की मदद लें।

Hemodialysis और Peritoneal dialysis में क्या फर्क है?

हेमोडायलिसिस में मशीन द्वारा शरीर के बाहर रक्त शुद्धिकरण, dialysis center में जाना जरूरी। पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की झिल्ली द्वारा शरीर के अंदर शुद्धिकरण, घर पर संभव। पेरिटोनियल डायलिसिस आमतौर पर सस्ती और अधिक flexible होती है।

क्या डायलिसिस से किडनी ठीक हो सकती है?

नहीं, डायलिसिस kidney failure को ठीक नहीं करती, यह केवल failed kidneys का काम करती है। यह जीवन को लंबा करने में मदद करती है लेकिन स्थायी इलाज kidney transplant ही है।

किडनी ट्रांसप्लांट बेहतर है या डायलिसिस?

Kidney transplant बेहतर quality of life और longer lifespan देता है। लेकिन suitable donor की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। डायलिसिस व्यापक रूप से उपलब्ध है और कम invasive है।

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