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भगंदर (एनल फिस्टुला): कारण, लक्षण और सबसे सफल इलाज

भगंदर, जिसे मेडिकल भाषा में 'एनल फिस्टुला' (Anal Fistula) भी कहते हैं, एक बहुत ही तकलीफदेह बीमारी है। यह कोई आम फोड़ा या फुंसी नहीं है, बल्कि एक गंभीर समस्या है जिसे सही इलाज की ज़रूरत होती है। सोचिए, आपके गुदा (anus) के अंदर और बाहर की त्वचा के बीच एक अनचाही सुरंग या ट्यूब बन गई है। यह सुरंग अंदर की गंदगी और इन्फेक्शन को बाहर त्वचा तक ले आती है, जिससे वहां एक फोड़ा बन जाता है। इस फोड़े से लगातार मवाद (pus), खून और बदबूदार पानी निकलता रहता है।

SCI हॉस्पिटल पिछले कई सालों से भगंदर के हज़ारों मरीज़ों का सफलतापूर्वक इलाज कर रहा है। हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर और आधुनिक तकनीकें यह सुनिश्चित करती हैं कि आपको इस बीमारी से हमेशा के लिए छुटकारा मिले। अगर आपको या आपके किसी अपने को भगंदर के लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो घबराएं नहीं।

भगंदर के मुख्य लक्षण (Key Symptoms of Fistula)

भगंदर के लक्षण शुरुआत में हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ ये गंभीर हो जाते हैं। अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। SCI हॉस्पिटल में आप विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं। भगंदर के कुछ मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • गुदा के पास बार-बार फोड़ा होना: एक ही जगह पर बार-बार फोड़ा बनना भगंदर का सबसे बड़ा संकेत है। यह फोड़ा कुछ दिन रहता है, फूट जाता है, और फिर कुछ हफ़्तों या महीनों बाद दोबारा उसी जगह पर हो जाता है।
  • गुदा के पास एक छोटा छेद: आपको अपनी गुदा के पास त्वचा पर एक छोटा सा छेद (opening) दिखाई दे सकता है, जिससे लगातार या रुक-रुक कर मवाद, खून या पानी जैसा पदार्थ निकलता रहता है।
  • दर्द और सूजन: गुदा के आसपास लगातार हल्का या तेज दर्द बना रहता है। बैठने, चलने-फिरने या मल त्याग करते समय यह दर्द बढ़ सकता है। इसके साथ ही उस जगह पर सूजन और लालिमा भी हो सकती है।
  • मल त्याग में दर्द: जब मल इस अंदरूनी रास्ते से गुज़रता है, तो जलन और तेज दर्द महसूस हो सकता है।
  • बदबूदार स्राव (Foul-smelling discharge): फिस्टुला के बाहरी छेद से आने वाले मवाद या पानी में अक्सर बहुत गंदी बदबू होती है, जिसके कारण मरीज़ को शर्मिंदगी महसूस होती है।
  • बुखार और थकान: अगर इन्फेक्शन ज़्यादा बढ़ जाए, तो मरीज़ को बुखार, ठंड लगना और बहुत ज़्यादा थकान महसूस हो सकती है। यह एक गंभीर स्थिति का संकेत है और इसमें तुरंत मेडिकल मदद की ज़रूरत होती है।
  • त्वचा में जलन: लगातार नमी और मवाद निकलने के कारण गुदा के आसपास की त्वचा में जलन, खुजली और रैशेज हो सकते हैं।

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भगंदर के कारण और जोखिम कारक (Causes and Risk Factors)


भगंदर क्यों होता है, यह समझना इसके सही इलाज और बचाव के लिए बहुत ज़रूरी है। ज़्यादातर मामलों में इसकी शुरुआत गुदा के अंदर मौजूद छोटी ग्रंथियों (anal glands) के इन्फेक्शन से होती है। आइए इसके मुख्य कारणों और जोखिम कारकों को विस्तार से जानते हैं:

भगंदर के मुख्य कारण

गुदा का फोड़ा (Anal Abscess):

यह भगंदर का सबसे आम कारण है। हमारी गुदा के अंदर कुछ छोटी ग्रंथियां होती हैं जो म्यूकस बनाती हैं, जिससे मल त्याग में आसानी होती है। कभी-कभी ये ग्रंथियां बंद हो जाती हैं, और बैक्टीरिया के कारण इनमें इन्फेक्शन होकर मवाद भर जाता है। इसे 'गुदा का फोड़ा' कहते हैं।

जब यह फोड़ा बढ़कर त्वचा की तरफ अपना रास्ता बना लेता है और बाहर फूट जाता है, तो यह एक सुरंग या 'फिस्टुला' का रूप ले लेता है। लगभग 50% लोगों को, जिन्हें गुदा का फोड़ा होता है, उन्हें बाद में भगंदर हो जाता है।

भगंदर के अन्य जोखिम कारक:

  • क्रोहन रोग (Crohn's Disease): यह आंतों की एक पुरानी सूजन की बीमारी है। क्रोहन रोग के मरीज़ों में भगंदर होने का खतरा बहुत ज़्यादा होता है क्योंकि उनकी आंतों में लगातार सूजन बनी रहती है।
  • डायवर्टीकुलाइटिस (Diverticulitis): यह बड़ी आंत की दीवारों में छोटी थैलियों (diverticula) में सूजन और इन्फेक्शन के कारण होता है। यह भी भगंदर का कारण बन सकता है।
  • टीबी (Tuberculosis): हालांकि यह फेफड़ों की बीमारी मानी जाती है, लेकिन टीबी का इन्फेक्शन शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, जिसमें गुदा का क्षेत्र भी शामिल है।
  • कैंसर: बहुत ही दुर्लभ मामलों में, गुदा का कैंसर (anal cancer) या रेक्टल कैंसर (rectal cancer) भी भगंदर का कारण हो सकता है।
  • सर्जरी या चोट: गुदा क्षेत्र में पहले हुई कोई सर्जरी, चोट या प्रसव के दौरान लगी चोट भी फिस्टुला बनने का कारण हो सकती है।
  • यौन संचारित रोग (STDs): कुछ यौन संचारित रोग जैसे क्लैमाइडिया (Chlamydia) या सिफलिस (Syphilis) भी गुदा में इन्फेक्शन और फोड़े पैदा कर सकते हैं, जो बाद में भगंदर बन जाते हैं।
  • कमजोर इम्युनिटी: एचआईवी (HIV) या अन्य बीमारियों के कारण जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) कमज़ोर होती है, उनमें इन्फेक्शन का खतरा ज़्यादा होता है, जिससे भगंदर हो सकता है।

भगंदर का प्रकार


भगंदर का इलाज इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि वह किस प्रकार का है। डॉक्टर सर्जरी की योजना बनाने से पहले फिस्टुला के प्रकार का पता लगाते हैं। मुख्य रूप से, फिस्टुला को उसकी बनावट और गुदा की मांसपेशियों (sphincter muscles) के संबंध में उसकी स्थिति के आधार पर बांटा जाता है।

ये मांसपेशियां मल को नियंत्रित करने का काम करती हैं, इसलिए इलाज के दौरान इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी होता है। SCI हॉस्पिटल के सर्जन इन मांसपेशियों को सुरक्षित रखते हुए इलाज करने में माहिर हैं।

सामान्य या जटिल फिस्टुला (Simple or Complex Fistula)

यह वर्गीकरण फिस्टुला के रास्ते की बनावट पर आधारित है।

सामान्य फिस्टुला (Simple Fistula):

  • इसमें एक ही सीधा रास्ता (single track) होता है।
  • यह गुदा की मांसपेशियों के बहुत छोटे हिस्से को पार करता है।
  • इसमें कोई और शाखा या फोड़ा नहीं होता है।
  • इसका इलाज करना अपेक्षाकृत आसान होता है और सफलता दर बहुत अच्छी होती है।

जटिल फिस्टुला (Complex Fistula):

  • इसमें एक से ज़्यादा रास्ते या शाखाएं (multiple tracks) हो सकती हैं, जो घोड़े की नाल (horseshoe) जैसा आकार बना सकती हैं।
  • यह गुदा की मांसपेशियों (sphincter muscles) के एक बड़े हिस्से को पार करता है।
  • यह किसी अन्य बीमारी जैसे क्रोहन रोग (Crohn's Disease) के कारण हो सकता है।
  • इसमें बार-बार फोड़े बनते रहते हैं।
  • जटिल फिस्टुला का इलाज ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होता है और इसके लिए विशेषज्ञ सर्जन और उन्नत तकनीकों की ज़रूरत होती है, जो SCI हॉस्पिटल में उपलब्ध हैं।

लो या हाई फिस्टुला (Low or High Fistula)

यह वर्गीकरण इस बात पर आधारित है कि फिस्टुला का रास्ता गुदा की स्फिंक्टर मांसपेशियों के कितना ऊपर या नीचे से गुज़रता है।

लो फिस्टुला (Low Fistula):

  • यह फिस्टुला स्फिंक्टर मांसपेशियों के निचले हिस्से से गुज़रता है या उन्हें बिल्कुल भी पार नहीं करता।
  • ज़्यादातर भगंदर इसी प्रकार के होते हैं।
  • इनका इलाज करना आसान और सुरक्षित माना जाता है क्योंकि मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने का खतरा कम होता है।

हाई फिस्टुला (High Fistula):

  • यह फिस्टुला स्फिंक्टर मांसपेशियों के एक बड़े और ऊपरी हिस्से को पार करता है।
  • यह कम आम लेकिन ज़्यादा गंभीर होता है।
  • इसका इलाज बहुत सावधानी से करना पड़ता है, क्योंकि गलत तरीके से सर्जरी करने पर मल रोकने की क्षमता (continence) पर असर पड़ सकता है।

फिस्टुला का सही प्रकार जानने के लिए डॉक्टर शारीरिक जांच के अलावा एमआरआई (MRI) जैसे टेस्ट की सलाह देते हैं, ताकि इलाज की सबसे अच्छी योजना बनाई जा सके।

भगंदर का निदान


भगंदर का सही और सफल इलाज करने के लिए सबसे पहला और ज़रूरी कदम है उसका सटीक निदान (diagnosis)। निदान का मतलब है यह पता लगाना कि समस्या वास्तव में भगंदर ही है, वह किस प्रकार का है, उसका रास्ता कहां से कहां तक है, और वह गुदा की मांसपेशियों को कितना प्रभावित कर रहा है।

ओपीडी में डॉक्टर की जांच (Doctor's Examination in OPD)

इसके बाद, डॉक्टर शारीरिक जांच करते हैं। इसमें शामिल हैं:

  • बाहरी जांच: डॉक्टर गुदा के आसपास की त्वचा को ध्यान से देखते हैं। वे फिस्टुला के बाहरी छेद, सूजन, लालिमा और मवाद के निकलने की जांच करते हैं।
  • डिजिटल रेक्टल परीक्षण (Digital Rectal Examination - DRE): इसमें डॉक्टर दस्ताने पहनकर और लुब्रिकेंट लगाकर अपनी एक उंगली गुदा के अंदर डालकर जांच करते हैं। इससे उन्हें फिस्टुला के अंदरूनी रास्ते, उसकी कठोरता और मांसपेशियों की स्थिति का अंदाज़ा लगता है। यह जांच थोड़ी असहज हो सकती है, लेकिन इसमें दर्द नहीं होता और यह बहुत महत्वपूर्ण जानकारी देती है।
  • प्रोक्टोस्कोपी (Proctoscopy): अगर ज़रूरत हो, तो डॉक्टर एक छोटे, पतले ट्यूब जैसे उपकरण (प्रोक्टोस्कोप) का उपयोग करके गुदा के अंदरूनी हिस्से को देखते हैं ताकि फिस्टुला के अंदरूनी छेद का पता लगाया जा सके।

आधुनिक जांच तकनीकें (Modern Diagnostic Techniques)

कई बार, खासकर जटिल या हाई फिस्टुला के मामलों में, सिर्फ़ शारीरिक जांच काफी नहीं होती। फिस्टुला के पूरे रास्ते का नक्शा (map) बनाने के लिए कुछ और टेस्ट की ज़रूरत पड़ती है। ये टेस्ट सर्जरी की योजना बनाने के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

  • एमआरआई (MRI - Magnetic Resonance Imaging): इसे भगंदर के निदान के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' यानी सबसे अच्छा टेस्ट माना जाता है। एमआरआई स्कैन से फिस्टुला के रास्ते, उसकी शाखाओं और स्फिंक्टर मांसपेशियों के साथ उसके संबंध की एक बहुत ही साफ़ और विस्तृत 3D तस्वीर मिल जाती है। इससे सर्जन को ऑपरेशन से पहले ही पता चल जाता है कि उन्हें सर्जरी कैसे करनी है। SCI हॉस्पिटल में मरीज़ों को उच्च-गुणवत्ता वाले एमआरआई स्कैन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
  • एंडोएनल अल्ट्रासाउंड (Endoanal Ultrasound): इस टेस्ट में एक छोटा अल्ट्रासाउंड प्रोब गुदा के अंदर डाला जाता है। यह ध्वनि तरंगों का उपयोग करके फिस्टुला के रास्ते और आसपास की मांसपेशियों की तस्वीर बनाता है। यह भी एमआरआई की तरह ही एक बहुत उपयोगी जांच है।
  • फिस्टुलोग्राम (Fistulogram): यह एक प्रकार का एक्स-रे है। इसमें फिस्टुला के बाहरी छेद से एक विशेष डाई (contrast agent) इंजेक्ट की जाती है और फिर एक्स-रे लिया जाता है। इससे डाई फिस्टुला के रास्ते में फैल जाती है और एक्स-रे में उसका पूरा रास्ता दिखाई देता है। हालांकि, एमआरआई के आने के बाद इसका इस्तेमाल अब कम हो गया है।

भगंदर का उपचार


भगंदर एक ऐसी बीमारी है जो दवाओं या घरेलू नुस्खों से ठीक नहीं होती। फिस्टुला का जो अप्राकृतिक रास्ता (tunnel) बन गया है, उसे बंद करने के लिए लगभग हमेशा सर्जरी की ही ज़रूरत पड़ती है। दवाओं से केवल अस्थायी रूप से इन्फेक्शन और दर्द को कम किया जा सकता है, लेकिन यह समस्या को जड़ से खत्म नहीं करतीं।

सर्जिकल उपचार (Surgical Treatment)

सर्जरी ही भगंदर का सबसे प्रभावी और स्थायी इलाज है। आज के समय में कई आधुनिक और मिनिमली इनवेसिव (कम चीर-फाड़ वाली) सर्जिकल तकनीकें उपलब्ध हैं, जिनसे मरीज़ को दर्द कम होता है और रिकवरी बहुत जल्दी होती है। SCI हॉस्पिटल इन सभी आधुनिक तकनीकों से लैस है।

सर्जरी के कुछ प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:

  • फिस्टुलोटॉमी (Fistulotomy): यह भगंदर की सबसे आम और सफल सर्जरी है, खासकर सामान्य और लो फिस्टुला के लिए। इसमें सर्जन फिस्टुला के पूरे रास्ते को ऊपर से काटकर खोल देते हैं, उसे अंदर से अच्छी तरह साफ करते हैं और फिर उसे खुला छोड़ देते हैं ताकि वह अंदर से बाहर की ओर धीरे-धीरे भर सके। इसकी सफलता दर 90% से भी ज़्यादा है।
  • सेटन तकनीक (Seton Technique): यह तकनीक जटिल या हाई फिस्टुला के लिए इस्तेमाल की जाती है, जहां मांसपेशियों को काटने का खतरा होता है। इसमें एक विशेष सर्जिकल धागा, जिसे 'सेटन' कहते हैं, फिस्टुला के रास्ते में डाल दिया जाता है और उसके दोनों सिरों को बाहर बांध दिया जाता है।
  • लेजर सर्जरी (Laser Surgery - FiLaC®): यह एक बहुत ही आधुनिक और प्रभावी मिनिमली इनवेसिव तकनीक है। इसमें फिस्टुला के रास्ते में एक पतली लेजर फाइबर डाली जाती है। लेजर की ऊर्जा से फिस्टुला के अंदरूनी ऊतकों को नष्ट करके उसे अंदर से सील कर दिया जाता है। इसमें कोई बड़ा कट नहीं लगता, दर्द बहुत कम होता है, खून बहना न के बराबर होता है, और मरीज़ बहुत जल्दी ठीक होकर अपने काम पर लौट सकता है।
  • VAAFT (वीडियो-असिस्टेड एनल फिस्टुला ट्रीटमेंट): यह भी एक बहुत उन्नत दूरबीन (endoscopic) विधि है। इसमें एक बहुत पतले एंडोस्कोप को फिस्टुला के रास्ते में डाला जाता है। कैमरे की मदद से सर्जन अंदर के पूरे रास्ते को स्क्रीन पर देखते हैं, उसे अच्छी तरह साफ करते हैं और फिर अंदरूनी छेद को बंद कर देते हैं।
  • LIFT प्रक्रिया (Ligation of Intersphincteric Fistula Tract): यह हाई फिस्टुला के लिए एक और मांसपेशियों को बचाने वाली (sphincter-sparing) तकनीक है। इसमें स्फिंक्टर मांसपेशियों के बीच एक छोटा चीरा लगाकर फिस्टुला के रास्ते को बांधकर काट दिया जाता है।

सर्जरी के बाद की देखभाल (Post-Surgical Care)

सर्जरी की सफलता जितनी सर्जन के कौशल पर निर्भर करती है, उतनी ही मरीज़ द्वारा की जाने वाली देखभाल पर भी।

  • सिट्ज़ बाथ (Sitz Bath): दिन में 2-3 बार हल्के गर्म पानी के टब में 10-15 मिनट के लिए बैठें। इससे दर्द और सूजन कम होती है और घाव साफ रहता है।
  • आहार: खूब सारा पानी पिएं और फाइबर युक्त भोजन (फल, सब्जियां, दलिया, इसबगोल) खाएं ताकि कब्ज न हो और मल मुलायम रहे।
  • दवाएं: डॉक्टर द्वारा दी गई दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाएं समय पर लें।
  • स्वच्छता: घाव वाले क्षेत्र को साफ और सूखा रखें।
  • फॉलो-अप: डॉक्टर द्वारा बताए गए समय पर फॉलो-अप के लिए SCI हॉस्पिटल ज़रूर आएं ताकि आपकी रिकवरी पर नज़र रखी जा सके।

नॉन-सर्जिकल उपचार (Non-Surgical Treatment)

यह समझना बहुत ज़रूरी है कि नॉन-सर्जिकल तरीके भगंदर को जड़ से खत्म नहीं कर सकते। ये केवल लक्षणों में राहत दे सकते हैं या सर्जरी के साथ सहायक उपचार के रूप में काम आ सकते हैं। किसी भी घरेलू उपाय को आज़माने से पहले हमेशा डॉक्टर से सलाह लें।

भगंदर में खान-पान और जीवनशैली (Diet and Lifestyle in Fistula)

सही खान-पान और जीवनशैली अपनाना इलाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, खासकर सर्जरी के बाद जल्दी रिकवरी के लिए।

क्या खाएं:

  • उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थ: अपनी डाइट में भरपूर मात्रा में फाइबर शामिल करें। इसके लिए साबुत अनाज (गेहूं, जई, दलिया), दालें, बीन्स, इसबगोल की भूसी और चिया सीड्स का सेवन करें।
  • फल और सब्जियां: पपीता, सेब, केला, नाशपाती जैसे फल और पालक, गाजर, खीरा जैसी सब्जियां खाएं।
  • तरल पदार्थ: दिन में 8-10 गिलास पानी ज़रूर पिएं। इसके अलावा नारियल पानी, छाछ और सूप भी फायदेमंद हैं।
  • प्रोबायोटिक्स: दही और छाछ जैसे प्रोबायोटिक्स आंतों के स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं।

क्या न खाएं:

  • मसालेदार और तला हुआ भोजन: ज़्यादा मिर्च-मसाले वाला और तला हुआ खाना जलन पैदा कर सकता है।
  • मैदा और प्रोसेस्ड फूड: मैदा, सफेद ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स और जंक फूड से बचें क्योंकि ये कब्ज पैदा करते हैं।
  • रेड मीट: रेड मीट को पचाना मुश्किल होता है, इसलिए इससे परहेज करें।
  • कैफीन और शराब: चाय, कॉफी और शराब का सेवन कम करें क्योंकि ये शरीर को डिहाइड्रेट कर सकते हैं।

भगंदर से जुड़े मिथक और तथ्य (Myths and Facts about Fistula)

भगंदर को लेकर समाज में कई गलत धारणाएं और मिथक फैले हुए हैं, जो मरीज़ों को डराते हैं और उन्हें सही इलाज लेने से रोकते हैं। आइए इन मिथकों का सच जानते हैं।

मिथक 1: भगंदर सिर्फ एक फुंसी है, यह अपने आप ठीक हो जाएगा।

तथ्य: यह बिल्कुल गलत है। भगंदर एक फुंसी नहीं, बल्कि त्वचा और गुदा नहर के बीच एक anormal सुरंग है। यह अपने आप कभी ठीक नहीं होता। इसे अनदेखा करने पर इन्फेक्शन बढ़ सकता है और यह और भी जटिल (complex) हो सकता है।

मिथक 2: भगंदर का इलाज सिर्फ दर्दनाक और बड़ी सर्जरी से ही होता है।

तथ्य: यह पुरानी बात है। आज के समय में लेजर सर्जरी (FiLaC) और VAAFT जैसी कई मिनिमली इनवेसिव तकनीकें मौजूद हैं।

मिथक 3: भगंदर की सर्जरी के बाद मल त्याग पर कंट्रोल खत्म हो जाता है।

तथ्य: यह भगंदर से जुड़ा सबसे बड़ा डर है। अगर सर्जरी किसी अनुभवहीन डॉक्टर से कराई जाए तो ऐसा जोखिम हो सकता है।

मिथक 4: घरेलू नुस्खे या दवाएं भगंदर को जड़ से खत्म कर सकती हैं।

तथ्य: कोई भी दवा, क्रीम या घरेलू उपाय फिस्टुला की सुरंग को बंद नहीं कर सकता। ये उपाय केवल अस्थायी रूप से दर्द, सूजन और इन्फेक्शन को कम कर सकते हैं। भगंदर का एकमात्र स्थायी इलाज सर्जरी ही है।

मिथक 5: भगंदर एक बार ठीक होने के बाद बार-बार होता है।

तथ्य: अगर फिस्टुला का सही तरीके से निदान करके और सही सर्जिकल तकनीक से उसका पूरा इलाज किया जाए, तो इसके दोबारा होने की संभावना बहुत कम (5-10%) होती है। इलाज अधूरा रहने या गलत तकनीक का इस्तेमाल होने पर ही यह दोबारा हो सकता है।

मिथक 6: भगंदर बवासीर का ही एक रूप है।

तथ्य: नहीं, भगंदर (Fistula) और बवासीर (Piles/Hemorrhoids) दो बिल्कुल अलग बीमारियां हैं। बवासीर में गुदा की नसें सूज जाती हैं, जबकि भगंदर में एक संक्रमित सुरंग बन जाती है। दोनों के लक्षण और इलाज पूरी तरह से अलग हैं।

भगंदर से बचाव के तरीके (Ways to Prevent Fistula)

हालांकि सभी तरह के भगंदर को रोकना संभव नहीं है, खासकर जो क्रोहन रोग जैसी बीमारियों के कारण होते हैं, फिर भी एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर आप इसका खतरा काफी हद तक कम कर सकते हैं।

  • कब्ज से बचें: कब्ज भगंदर सहित कई गुदा रोगों की जड़ है। इससे बचने के लिए अपनी डाइट में फाइबर युक्त आहार जैसे फल, सब्जियां, सलाद और साबुत अनाज शामिल करें।
  • पर्याप्त पानी पिएं: दिन भर में कम से कम 8-10 गिलास पानी पिएं। यह आपके मल को नरम रखने में मदद करता है, जिससे मल त्याग के समय ज़ोर नहीं लगाना पड़ता।
  • गुदा की स्वच्छता बनाए रखें: हर बार मल त्याग के बाद गुदा क्षेत्र को पानी से अच्छी तरह साफ करें और उसे मुलायम तौलिये से सुखाएं। कठोर टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल करने से बचें।
  • गुदा के फोड़े का तुरंत इलाज कराएं: अगर आपको गुदा के पास कोई फोड़ा या गांठ महसूस होती है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें। तुरंत SCI हॉस्पिटल में डॉक्टर को दिखाएं। फोड़े का सही समय पर इलाज कराने से उसे भगंदर बनने से रोका जा सकता है।
  • ज़्यादा देर तक टॉयलेट में न बैठें: टॉयलेट में मोबाइल या अखबार लेकर ज़्यादा देर तक बैठने की आदत छोड़ दें। इससे गुदा क्षेत्र पर अनावश्यक दबाव पड़ता है।
  • नियमित व्यायाम करें: रोजाना कम से कम 30 मिनट पैदल चलना या हल्का व्यायाम करना पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और कब्ज को रोकने में मदद करता है।
  • स्वस्थ वजन बनाए रखें: अधिक वजन होने से भी गुदा क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है, इसलिए स्वस्थ आहार और व्यायाम के माध्यम से अपना वजन नियंत्रित रखें।




Dr. Manish Gupta

MBBS, MS - ENT, ENT/ Otorhinolaryngologist

  • ENT/ Otorhinolaryngologist
  • 24+ Years Experience







FAQs

पारंपरिक सर्जरी (फिस्टुलोटॉमी) के बाद कुछ दिनों तक दर्द रह सकता है, जिसे दवाओं से नियंत्रित किया जाता है। लेकिन SCI हॉस्पिटल में उपलब्ध आधुनिक लेजर सर्जरी और VAAFT जैसी प्रक्रियाओं में दर्द न के बराबर होता है और मरीज़ बहुत सहज महसूस करता है।

यह सर्जरी के प्रकार पर निर्भर करता है। लेजर सर्जरी या VAAFT के बाद मरीज़ 2-3 दिनों में ही चलने-फिरने और अपने हल्के-फुल्के काम करने लगता है और 1 हफ्ते के अंदर ऑफिस भी जा सकता है। पारंपरिक सर्जरी में पूरी तरह ठीक होने में 4 से 6 हफ्ते लग सकते हैं।

नहीं, भगंदर का स्थायी इलाज बिना सर्जरी के संभव नहीं है। दवाएं या घरेलू उपाय केवल अस्थायी राहत दे सकते हैं, लेकिन वे उस संक्रमित सुरंग को बंद नहीं कर सकते जो बन चुकी है।

इलाज का खर्च फिस्टुला के प्रकार, उसकी जटिलता और चुनी गई सर्जरी की तकनीक पर निर्भर करता है। SCI हॉस्पिटल में हम मरीज़ों को पारदर्शी बिलिंग और किफायती पैकेज प्रदान करते हैं। आप हमारे हॉस्पिटल में आकर या फोन पर संपर्क करके विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी टीम आपको इंश्योरेंस और ईएमआई (EMI) विकल्पों के बारे में भी मार्गदर्शन करेगी।

यह बहुत ही दुर्लभ है, लेकिन कुछ मामलों में लंबे समय तक रहने वाला और इलाज न किया गया भगंदर गुदा कैंसर का रूप ले सकता है। इसलिए, भगंदर का सही समय पर इलाज कराना बहुत ज़रूरी है।

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Written By: डॉ. सुमीत शाह
Education: MBBS, MS - General Surgery, DNB - General Surgery
Experience: 30 Years

डॉ. सुमीत शाह एक अत्यंत सम्मानित और अनुभवी जनरल सर्जन, लैप्रोस्कोपिक सर्जन और बैरिएट्रिक सर्जन हैं, जिनका चिकित्सा क्षेत्र में 30 वर्षों का शानदार अनुभव है। अपने लंबे और प्रतिष्ठित करियर के दौरान, डॉ. शाह ने पाइल्स, फिशर, फिस्टुला, पिलोनीडल साइनस, पित्त की पथरी (गॉलस्टोन) और लैप कोले (Lap Chole) जैसी विभिन्न स्थितियों के इलाज में खुद को एक अग्रणी विशेषज्ञ के रूप में स्थापित किया है। अपने व्यापक अनुभव और गहन विशेषज्ञता के कारण, उन्होंने एक समर्पित और कुशल सर्जन के रूप में अपनी पहचान बनाई है, जो प्रत्येक स्थिति की जटिलताओं को गहराई से समझते हैं।

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अजय मेहरा
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मैं कई महीनों से भगंदर की समस्या से जूझ रहा था। बार-बार गुदा के पास फोड़ा बनता, फूट जाता और फिर वापस आ जाता था। लगातार मवाद और बदबू की वजह से ऑफिस जाना और लोगों से मिलना बहुत शर्मनाक हो गया था। SCI हॉस्पिटल में डॉ. सुमीत शाह ने मेरा पूरा एमआरआई करवाकर फिस्टुला की सही स्थिति समझाई और लेजर सर्जरी (FiLaC) की सलाह दी। सर्जरी के बाद दर्द बहुत कम रहा, कोई बड़ा कट नहीं लगा और कुछ ही दिनों में स्राव भी बंद हो गया। अब मैं बिना किसी डर और असुविधा के अपनी सामान्य जिंदगी जी रहा हूं।
मोहित चौहान
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मुझे गुदा के पास बार-बार बनते फोड़े की वजह से चलना-फिरना, बैठना और सोना तक मुश्किल हो गया था। कई बार स्थानीय डॉक्टर से दवाएं और ड्रेसिंग करवाईं, लेकिन आराम सिर्फ कुछ दिनों का ही रहता था। SCI हॉस्पिटल पहुंचने पर डॉक्टरों ने विस्तार से समझाया कि यह केवल फोड़ा नहीं, बल्कि भगंदर है, जिसका स्थायी इलाज सर्जरी ही है। VAAFT प्रोसीजर के बाद न तो बड़ा घाव हुआ, न ही मल त्याग पर कोई दिक्कत आई। आज महीनों हो गए हैं और दोबारा कोई फोड़ा या मवाद नहीं बना।