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बहुत से लोग इस समस्या के बारे में बात करने में झिझकते हैं, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि आप अकेले नहीं हैं। भारत में लाखों लोग इस तकलीफ से गुज़रते हैं। सही समय पर डॉक्टर से मिलना और सही इलाज लेना इस दर्द से छुटकारा पाने का सबसे अच्छा तरीका है।
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SCI हॉस्पिटल में हमारी अनुभवी डॉक्टरों की टीम पिछले कई सालों से हजारों मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज कर रही है। इस लेख में दी गई जानकारी हमारे विशेषज्ञों के गहरे अनुभव पर आधारित है, ताकि आप अपनी सेहत के लिए एक सही और आत्मविश्वास से भरा फैसला ले सकें।
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<h3>किन लोगों को इसका खतरा ज़्यादा होता है?</h3>
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कुछ लोगों में एनल फिशर होने का खतरा दूसरों से ज़्यादा होता है। इन जोखिम कारकों को जानना आपको सावधान रहने में मदद करेगा:
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<ul> <li><strong>शिशु और छोटे बच्चे:</strong> बच्चों में कब्ज की समस्या बहुत आम होती है, क्योंकि उनका पाचन तंत्र विकसित हो रहा होता है। इसलिए उनमें एक्यूट फिशर अक्सर देखा जाता है।</li> <li><strong>युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग:</strong> यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 20 से 40 साल की उम्र के लोगों में यह ज़्यादा आम है।</li> <li><strong>गर्भवती महिलाएं:</strong> गर्भावस्था और प्रसव के बाद के शुरुआती महीनों में महिलाओं को इसका खतरा अधिक होता है।</li> <li><strong>बुजुर्ग:</strong> उम्र बढ़ने के साथ पाचन तंत्र धीमा हो जाता है, शरीर में पानी की कमी हो सकती है और शारीरिक गतिविधि भी कम हो जाती है। ये सभी कारक कब्ज और फिशर की संभावना को बढ़ा देते हैं।</li> <li><strong>जिन लोगों को पहले फिशर हो चुका है:</strong> एक बार फिशर ठीक होने के बाद भी, अगर कब्ज की मूल समस्या का समाधान नहीं किया जाता है, तो इसके दोबारा होने का खतरा बहुत अधिक रहता है।</li> <li><strong>जो लोग भारी वजन उठाते हैं:</strong> जिम में भारी वजन उठाने या अन्य ज़ोर लगाने वाले काम करने से पेट के निचले हिस्से पर दबाव पड़ता है, जो फिशर का कारण बन सकता है।</li> </ul>
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<h3>भारतीय जीवनशैली से जुड़े कुछ खास कारण</h3>
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हमारी भारतीय जीवनशैली और खान-पान में कुछ ऐसी आदतें हैं जो अनजाने में एनल फिशर के खतरे को बढ़ा सकती हैं:
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<ul> <li><strong>कम फाइबर वाला भोजन:</strong> मैदे से बनी चीजें जैसे नान, भटूरे, समोसे, सफेद ब्रेड और बाजार में मिलने वाले प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन करना। इनमें फाइबर की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, जो कब्ज का मुख्य कारण है।</li> <li><strong>पानी कम पीना:</strong> भारत में, खासकर गर्मियों में, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) होना बहुत आम है। काम की भागदौड़ में हम अक्सर पर्याप्त पानी पीना भूल जाते हैं, जिससे मल कठोर हो जाता है।</li> <li><strong>मसालेदार और तला हुआ भोजन:</strong> ज़्यादा मिर्च-मसाले वाला और तला हुआ खाना खाने से पाचन तंत्र पर असर पड़ता है। इससे मल त्याग में जलन हो सकती है और पहले से मौजूद फिशर की स्थिति और खराब हो सकती है।</li> <li><strong>लंबे समय तक बैठे रहना:</strong> आजकल ऑफिस में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठने का चलन है। शारीरिक गतिविधि की कमी से आंतों की गति (bowel motility) धीमी हो जाती है और कब्ज का खतरा बढ़ जाता है।</li> <li><strong>तनाव (Stress):</strong> आधुनिक जीवन का तनाव हमारे पाचन तंत्र पर सीधा असर डालता है। ज़्यादा तनाव से कुछ लोगों को कब्ज और कुछ को दस्त की समस्या हो सकती है, जो दोनों ही फिशर का कारण बन सकते हैं।</li> </ul>
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<h3>दवाइयों से इलाज (मेडिकल ट्रीटमेंट)</h3>
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अगर घरेलू उपायों से कुछ हफ्तों में पूरा आराम नहीं मिलता है, तो SCI हॉस्पिटल के डॉक्टर आपको कुछ दवाएं दे सकते हैं। ये दवाएं आमतौर पर क्रीम, मलहम या खाने वाली गोलियों के रूप में होती हैं:
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<ul> <li><strong>लैक्सेटिव और स्टूल सॉफ्टनर (Laxatives and Stool Softeners):</strong> ये दवाएं मल को नरम करने और कब्ज को दूर करने में मदद करती हैं। डॉक्टर आपकी स्थिति के अनुसार सही लैक्सेटिव की सलाह देंगे।</li> <li><strong>लोकल एनेस्थेटिक क्रीम (Topical Anesthetics):</strong> लिडोकेन (Lidocaine) या लिग्नोकेन (Lignocaine) जैसी क्रीम को गुदा पर लगाने से दर्द और जलन तुरंत सुन्न हो जाती है। इसे मल त्याग से 10-15 मिनट पहले लगाया जा सकता है ताकि दर्द कम हो।</li> <li><strong>नाइट्रोग्लिसरीन ऑइंटमेंट (Nitroglycerin Ointment):</strong> यह एक प्रिस्क्रिप्शन दवा है। यह क्रीम गुदा की आंतरिक स्फिंक्टर मांसपेशियों को आराम देती है और उस क्षेत्र में खून का प्रवाह बढ़ाती है। इससे फिशर को तेजी से भरने में मदद मिलती है। इसके कुछ साइड-इफेक्ट्स जैसे तेज सिरदर्द हो सकते हैं, जिसके बारे में डॉक्टर आपको पहले ही बता देंगे।</li> <li><strong>कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स क्रीम (Calcium Channel Blockers):</strong> डिल्टियाजेम (Diltiazem) या निफेडिपिन (Nifedipine) जैसी क्रीम भी मांसपेशियों को आराम देने का काम करती हैं और इनके साइड-इफेक्ट्स नाइट्रोग्लिसरीन से कम होते हैं।</li> </ul>
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<h3>सर्जरी के बिना अन्य प्रक्रियाएं</h3>
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जब दवाएं भी पूरी तरह असर नहीं करती हैं या फिशर बार-बार हो रहा हो, तो कुछ नॉन-सर्जिकल प्रक्रियाएं भी अपनाई जा सकती हैं।
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<h4>बोटॉक्स इंजेक्शन (Botox Injection):</h4>
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बोटुलिनम टॉक्सिन (Botox) का एक छोटा इंजेक्शन सीधे गुदा की स्फिंक्टर मांसपेशियों में लगाया जाता है। यह उन मांसपेशियों को अस्थायी रूप से (लगभग 3-4 महीनों के लिए) पैरालाइज कर देता है, जिससे ऐंठन खत्म हो जाती है और फिशर को ठीक होने का पर्याप्त समय मिल जाता है। यह एक सुरक्षित और प्रभावी प्रक्रिया है।
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<h3>सर्जिकल इलाज: जब दवाएं काम न करें</h3>
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जब फिशर 6-8 हफ्तों से ज़्यादा पुराना हो जाए (क्रोनिक फिशर) और किसी भी दूसरे इलाज से ठीक न हो, या बार-बार हो रहा हो, तब सर्जरी की सलाह दी जाती है।
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<h3>लेटरल इंटरनल स्फिंक्टरोटॉमी (Lateral Internal Sphincterotomy - LIS):</h3>
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यह एनल फिशर के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' सर्जरी मानी जाती है। इसकी सफलता दर 95% से भी अधिक है। इस प्रक्रिया में, सर्जन गुदा की आंतरिक स्फिंक्टर मांसपेशी (जो हमारे नियंत्रण में नहीं होती) के एक बहुत छोटे से हिस्से में एक कट लगाते हैं। इससे मांसपेशी का तनाव और ऐंठन हमेशा के लिए कम हो जाती है, जिससे दर्द से तुरंत राहत मिलती है और बढ़ा हुआ रक्त प्रवाह फिशर को तेजी से भर देता है। यह एक छोटी और सुरक्षित सर्जरी है।
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<h3>लेजर ट्रीटमेंट: एक आधुनिक और सुरक्षित विकल्प</h3>
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लेजर ट्रीटमेंट एनल फिशर के इलाज का एक बहुत ही आधुनिक, न्यूनतम इनवेसिव और प्रभावी तरीका है। SCI हॉस्पिटल में हम इस उन्नत तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं, जिससे मरीजों को बहुत लाभ मिलता है।
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<ul> <li><strong>लेजर स्फिंक्टरोटॉमी:</strong> इसमें पारंपरिक सर्जरी की तरह ब्लेड से चीरा लगाने की बजाय एक नियंत्रित लेजर बीम का उपयोग करके स्फिंक्टर मांसपेशी को आराम दिया जाता है।</li> <li><strong>फिशरुलेक्टमी (Fissurectomy):</strong> लेजर का उपयोग फिशर के खराब और कठोर हो चुके टिश्यू को सटीकता से हटाने के लिए भी किया जाता है, जिससे नए और स्वस्थ टिश्यू को बढ़ने में मदद मिलती है।</li> </ul>
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<h3>लेजर ट्रीटमेंट के फायदे निम्नलिखित हैं:</h3>
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<ul> <li><strong>कम दर्द:</strong> इसमें कोई बड़ा कट नहीं लगता, इसलिए सर्जरी के बाद दर्द बहुत कम या न के बराबर होता है।</li> <li><strong>खून कम बहना:</strong> लेजर रक्त वाहिकाओं को काटते समय तुरंत सील कर देता है, जिससे खून नहीं बहता।</li> <li><strong>जल्दी रिकवरी:</strong> यह एक डे-केयर प्रक्रिया है। मरीज आमतौर पर उसी दिन हॉस्पिटल से घर जा सकता है और 2-3 दिनों में अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है।</li> <li><strong>इंफेक्शन का खतरा कम:</strong> लेजर प्रक्रिया बहुत सटीक और स्वच्छ होती है, जिससे इंफेक्शन का खतरा न्यूनतम हो जाता है।</li> <li><strong>कोई टांके नहीं:</strong> ज़्यादातर मामलों में टांकों की ज़रूरत नहीं पड़ती।</li> </ul>
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<h3>क्या न खाएं (Foods to Limit/Avoid):</h3>
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<ul> <li><strong>मैदा और रिफाइंड अनाज:</strong> सफेद ब्रेड, बिस्किट, नूडल्स, पास्ता, और मैदे से बनी अन्य चीजों से दूर रहें।</li> <li><strong>जंक और प्रोसेस्ड फूड:</strong> पिज्जा, बर्गर, चिप्स, और पैकेट बंद खाने से बचें क्योंकि इनमें फाइबर नहीं होता और ये कब्ज पैदा करते हैं।</li> <li><strong>कैफीन और शराब:</strong> चाय, कॉफी और शराब का सेवन कम करें क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) करते हैं, जिससे मल कठोर हो सकता है।</li> <li><strong>बहुत ज़्यादा मसालेदार और तला हुआ भोजन:</strong> इससे जलन बढ़ सकती है और पाचन क्रिया धीमी हो सकती है।</li> <li><strong>डेयरी प्रोडक्ट्स (कुछ मामलों में):</strong> कुछ लोगों को दूध और पनीर से कब्ज हो सकती है। अगर आपको ऐसा लगता है तो इनका सेवन कम करें।</li> </ul>
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